सनाढयों के सम्बन्ध में

प्राचीन काल में सिर्फ दो तरह के ब्राह्मण होते थे। एक- जो शहरों या गाँवों  में  रहकर पुरोहित या पुजारी का कार्य करते थे. दूसरे – दूर वनों में तपस्या / यज्ञ करते हुए आश्रमों में रहते थे. संस्कृत में ” सनेन  तपसः आद्य” का अपभृंश होकर सनाढ्य हो गया, इसका शाब्दिक अर्थ ” जो तपस्या में सबसे आगे हो”. ऐसा माना  जाता है, कि  त्रेता युग में भगवन राम ने सनाढयों के लिए ७५० गांव,  गंगा यमुना के आसपास  स्थापित कर उन्हें सुरक्षा दी थी.

सनाढ्य ब्राह्मण मूलतः उत्तर भारत के हैं. परन्तु  वर्तमान में , पश्चिम उत्तरप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बुंदेलखंड, मध्य भारत, नर्मदा घाटी के आसपास और छत्तीसगढ़ में रह रहे हैं. उत्तर से इनका विस्थापन, अफगान- कश्मीर सीमा से लगातार होने वाले मुगलों के हमलों के कारण  , शुरू हुआ  था. पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों  की हार के बाद ब्रह्मणों को मजबूरी में, पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा. क्रमशः हुए इस विस्थापन में स्थानीय कारणों से ब्रह्मिणों के विभिन्न ग्रुप बनते चले गए. जो कन्नौज -कानपूर छेत्र में बस   गए वे कान्यकुब्ज, सरयू नदी के पार  – सरयूपारी , मिथिला के आसपास मैथिल ब्राह्मण . इसी प्रकार नए नए ग्रुप बनते चले गए. लगता है, इसी तरह  अपने अधिकारों  और अस्तित्व के लिए लड़ने वाले  अपने को जुझौतिया कहने लगे.

उत्तर से विस्थापित परिवार , जमीन  जायदाद का विभाजन होते रहने के कारण  बंटते चले गए. जिसको संपत्ति का अच्छा हिस्सा मिल गया वो वहीं बस  गया  और नाराज या असंतुस्ट  ग्रुप आगे निकल गया . ऐसे बहुत से ग्रुप अलीगढ, आगरा , मथुरा, ग्वालियर के आसपास   बस  गए . इनमें से कुछ राजस्थान के तरफ और कुछ मध्य भारत तथा  बुंदेलखण्ड  (झांसी/सागर छेत्र) की तरफ बढ़ गए और वहीँ  रहने लगे.

इस समय नर्मदा घाटी में पिंडारी और ठगों का आतंक फैला था. ब्रिटिश कर्नल स्लीमन ने इन गिरोहों का समूल नाश कर पूरे नर्मदा  छेत्र को निवास योग्य बना दिया.  इस तरह  उत्तर से चले ब्राह्मण परिवारों को, नर्मदा घाटी के ऊपरी  मंडला से जबलपुर , नरसिंगपुर, होशंगाबाद , हरदा, निमाड़ के खंडवा,  और मालवा के उज्जैन- इंदौर चैत्र  अंतिम रूप से आखिरी पड़ाव के रूप में मिल ही गए . नर्मदा के निचले इलाके में बसे   लोगों ने  अपने को एक नया  नाम नार्मदीय ब्राह्मण दे दिया। कुछ परिवार व्यवसायिक एवं अन्य कारणों से मंडला / नरसिंगपुर से नीचे छिन्दवाड़ा , नागपुर  होते हुए महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अंतिम रूप से बस गए.

विस्थापन का मुख्य कारण सम्पत्ति का विभाजन ही था. इसमें जिसे बड़ा हिस्सा मिला वह उसी जगह पर बस गया और जिन्हे कम हिस्सा मिला या बिलकुल ही नहीं मिला वह आगे बढ़ते  गए. सन १९३० तक यह विस्थापन लगभग पूरा हो चुका था , सिवाय व्यवसायिक कारणों के जिस हेतु अभी भी सनाढ्य परिवार नयी जगहों पर सटटलेड होते जा रहे हैं.

विस्थापन के इतने लम्बे और तकलीफदेह दौर में  भी सनाढयों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं में सुचिता बनाये रखी है । इन्ही कारणों  से कुछ अंश तक हमें दकियानूसी भी कहा  जाता  है.