ब्राह्मणत्व एवं सनाढ्यता

ब्राह्मणत्व मनुष्य समाज का महत्तम आदर्श है, वह एक एेसा ज्योतिर्गम्य व्यक्तित्व है, जो समस्त विचारो तथा ज्ञान की ओर और सत्य के अन्तः प्रवाहो की ओर उत्तरोत्तर खुलता जाता है. उच्चतम सत्ता के चरम स्पर्श तथा निम्नतर अंगो को आत्मा की परम ज्योति और शक्ति की ओर ऊपर ले जाने में एवं ज्ञान रश्मियों को अपने बहुमुखी विकास, समाज के मार्ग दर्शन तथा जगत में उन्ही के शासन के लिए निरंतर उद्योग करते रहना ही उसका अन्यतम उद्दयेश है.

ब्राह्मणों के लिए सारा जीवन ही तप है | वह वर्णाश्रम समाज व्यवस्था के आरम्भ से ही क्षुद्र वासनाओं, प्रलोभनों और आकर्षणों की ओर अपने को नियंत्रित कर समाज के सर्वोच्च उत्कर्ष और महान उपयोगी कार्यो के लिए अपने आपको होम करता रहा है | इसीलिए वेद से लेकर रामचरित मानस तक निःसंकोच रूप से ब्राह्मणों का असाधारण गौरव और सम्मान शत-शत बार वर्णित है |
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‘सनाढ्य’ शब्द में ब्राह्मणत्व के सभी महान आदर्श सन्निहित है | ‘ब्रह्म’ शब्द परमात्मा और वेद का वाचक है | परात्म तत्त्व, वैदिक ज्ञान, तप और विद्या की शिष्टता ही ब्राह्मण के स्वरूपाधायक गुण है | इसी प्रकार ‘सनस्तपसी वेदे च सत्वे विद्यानुभावयो: |'(कात्यायन)

‘सन:’ शब्द के भी तप, वेद विद्या अदि अर्थ है | निरंतारार्थक अनन्य में भी ‘सना’ शब्द का पाठ है | ‘आढ्य’ का अर्थ होता है धनी | फलतः जो तप, वेद, और विद्या के द्वारा निरंतर पूर्ण है, उसे ही “सनाढ्य” कहते है – ‘सनेन तपसा वेदेन च सना निरंतरमाढ्य: पूर्ण सनाढ्य:’

उपर्युक्त रीति से ‘सनाढ्य’ शब्द में ब्राह्मणत्व के सभी प्रकार अनुगत होने पर जो सनाढ्य है वे ब्राह्मण है और जो ब्राह्मण है वे सनाढ्य है | यह निर्विवाद सिद्ध है | अर्थात एसा कौन ब्राह्मण होगा, जो ‘सनाढ्य’ नहीं होना चाहेगा | भारतीय संस्कृति की महान धाराओं के निर्माण में सनाढ्यो का अप्रतिभ योगदान रहा है | वे अपने सुखो की उपेक्षा कर दीपबत्ती की तरह तिलतिल कर जल कर समाज के लिए मिटते रहे है |

द्वारा : विवेक कांकर (स्वामी), तेन्दूखेड़ा -नरसिंगपुर